शब्द बहुत कुछ कह जाते हैं...

कुछ हक़ीकत से रूबरू...कुछ मन की गुफ्तगू...

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बस इतना सा ख्वाब हैं.....

Posted On: 14 Jan, 2017 में

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अपराधों के अंधेरो में रोशनी से भरी एक शाम चाहिए !
जहाँ बनी हो दीवारें दुश्मनी की, वहाँ दोस्ती का एक जाम चाहिए !

हस्ती बनती नही दौलत और दवात की स्याही से
हस्ती जहाँ में बनाने की खातिर, अपनी एक पहचान चाहिए !

हल्की बहारों से डूब नही सकती गमों की कश्तीयाँ
इन्हे डुबाने के लिए खुशियों से भरा एक तूफान चाहिए !

झूठ की जमी पर नही चमकते सच्चाई के सितारे
इन्हे दिखाने के लिए अपना एक सच्चा आसमान चाहिए !

परख नही होती अच्छाई की चेहरो की बनावटों से
अच्छाई को तलाशने इंसाफ़ से भरा एक इम्तिहान चाहिए !

लग नही पाती छोटे इरादों से आसमान के सीढ़ियाँ
ज़मीं आस्मा मिलाने के लिए अपने इरादे महान चाहिए !

बह सकती हैं हर मुख से शब्दों की मीठी रसधार
बस इसे बहाने वाली अपनी मीठी ज़ुबान चाहिए !

हट सकता हैं फरेबी नकाब लोगो के चेहरो से
बेनकाब बेईमानों को करने, एक भयानक तूफान चाहिए !

रुक सकती हैं हैवानियत की हवा नेक कर्मों से
हैवानियत को इंसानियत में बदलने, हल्की सी मुस्कान चाहिए !

बँधती नही क़ानून से जुर्म के हाथों में जंजीरे
क़ानून से जुर्म छुपाने, आजकल सिर्फ़ दाम चाहिए !

मूड सकता हैं पहिया पाप का धर्म की ओर
घर घर में धर्म का पहरा ,बसा कण कण में भगवान चाहिए !

आशियाना था बरसों पहले जिस तरह का हमारा
अब मुझे वही आशियाना, ईमान और वही इंसान चाहिए !

जल जाएँ जिसमे जुर्म,झूठ और बेईमानी की अर्थियाँ
हस्ती अब भारत की बचाने, “जीत” ऐसा शमशान चाहिए !

जितेंद्र अग्रवाल “जीत”

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 16, 2017

प्रिय जितेंद्र तुम्हारे मन के भावों को प्रगट करती पंक्तियाँ आशियाना था बरसों पहले जिस तरह का हमारा अब मुझे वही आशियाना, ईमान और वही इंसान चाहिए ! जल जाएँ जिसमे जुर्म,झूठ और बेईमानी की अर्थियाँ हस्ती अब भारत की बचाने, “जीत” ऐसा शमशान चाहिए !

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
January 17, 2017

माता श्री ! मैं तो अभी सीखने की शृंखला में हूँ ! मेरी हर रचना पर सर्वप्रथम आप जैसे वरिष्ठ और सम्मानित लेखक की प्रतिक्रिया मेरी रचना का गौण उद्देश्य सफल कर देती हैं ! मेरे भावों को आपने समझ लिया मेरा लिखना सफल हो गया ! आपका आशीर्वाद इसी तरह बना रहे यही कामना हैं !


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