शब्द बहुत कुछ कह जाते हैं...

कुछ हक़ीकत से रूबरू...कुछ मन की गुफ्तगू...

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एक किस्सा छोटा सा मगर सवाल बड़े बड़े.....

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60 फीट की लावारिश सड़क जो अतिक्रमण का शिकार होने से साल दर साल संकुचित होते होते अब महज 30 फीट की रह गयी हैं! मतलब आधी से ज़्यादा सड़क गायब सी हो गयी हैं ! जैसे 3 फीट लंबा टेबल डोसा खाते खाते अंत में लूल हो जाता हैं ! एक तरफ अमीरों ने बड़ी बड़ी मीनारें बना ली तो दूसरी तरफ उन मीनारों की शोभा में चार चाँद लगाने ग़रीबों ने भी अपने झोपडे बाँध लिए ! अब उन्हे रोकेगा भी कौन आख़िर अनाथों की सुध बुध लेने की परम्परा यहाँ से लूल जो हो चुकी हैं ! जिनके मर गये बादशाह उनके फिरते फिरे वज़ीर ! फिर अचानक एक दिन सरकारी बाप भागता हुआ आता हैं अपने अनाथ हुए बेटे (सड़क) की सुध बुध लेने अपने कुछ सरकारी दोस्तो और कुछ सरकारी दस्तावेज़ों के साथ ! अब खूब खींचा खींची होती हैं और आख़िर कर बेवश बाप को अपने हक के लिए बुलडोज़र लाना पड़ता हैं! कुछ कामचोर कर्मचारियों की निगरानी में ग़रीबों के झोंपड़े पलक झपकते ही गिरा दिए जाते हैं क्यूकीं उनमे कोई पक्की निर्माण सामग्री तो लगी हुई होती नही हैं इसलिए कुछ सेकेंडो में ही वो धराशायी हो जाते हैं ! अमीरों की मीनारें पहले की तरह वैसे ही ग़रीबों के धराशायी झोंपड़े के सामने आँखे निकाली हुई खड़ी होती हैं और उनके गिरने के जश्न में शायद तालियाँ भी बजाती होगी वो अलग बात हैं हम उन तालियों की गड़गड़ाहट को सुन नही पाते ! अब भेदभाव की इस राजनीति में एक सवाल तो उठना लाजमी हैं ! आख़िर झोंपड़े ही क्यो गिरे ..गगनचुंबी मीनारें क्यूँ नही गिरी ? मतलब सॉफ हैं यहाँ का ग़रीब गूंगा हैं जो अपने हक के लिए बोल नही पाता और कभी कभी बोलता भी हैं तो उस समय अमीर बहरा हो जाता हैं उसकी बात सुनता ही नही हैं ! भूलवश कभी गुंगे और बहरे दोनो ठीक बोले और सुने तो अपना क़ानून अँधा हो जाता हैं जो सब कुछ देख नही पाता हैं ! अब गुंगे बहरे के संग संग एक अँधा भी हो जाए तो कहानी तो फिल्मी होनी ही हैं ! इस कॉमेडी फिल्म का अंत भी बस एक भद्दी मज़ाक के साथ हो जाता हैं ! कंगाली में आटा गीला होना कहावत शायद ऐसी जगह के लिए ही बनी हैं ! इस कहानी में सरकारी बाप अपने हक के लिए आया हैं वो सही हैं लेकिन जो भेदभाव की राजनीति हुई हैं वो कहाँ तक सही हैं ये तो आप सब जानते हैं ! ऐसे ही गुंगे बहरे अंधे मिलकर इस देश की विकास की संभावना को अपाहिज बना देते हैं ! अब छड़ी के सहारे चलने वाला देश तो धीरे धीरे ही बढ़ेगा आगे उसको अगर भगाने की कोशिश करोगे भी तो वो गिर भले ही जाएगा लेकिन भाग नही पाएगा ! अगर विश्व की रफ़्तार के संग भागना ही है तो पहले ये विकलांगता माफी चाहूँगा दिव्यंगता दूर करो, हाथ की छड़ी को दूर फेंको फिर देखो और दिखाओ दुनिया को भारत भी क्या चीज़ हैं ! ये विश्वास मेरा हैं कि फिर विकास के वर्ल्ड कप का विजेता अगर कोई होगा तो वो होगा भारत जिसके कप्तान होंगे नरेंद्र मोदी ! किसी की भावना अगर आहत हुई हो तो क्षमायाचना !
जितेंद्र हनुमान प्रसाद अग्रवाल “जीत”
मुंबई..मो. 08080134259



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
July 13, 2016

प्रिय जितेन्द्र मन के उद्गार “एक तरफ अमीरों ने बड़ी बड़ी मीनारें बना ली तो दूसरी तरफ उन मीनारों की शोभा में चार चाँद लगाने ग़रीबों ने भी अपने झोपडे बाँध लिए ! अब उन्हे रोकेगा भी कौन आख़िर अनाथों की सुध बुध लेने की परम्परा यहाँ से लूल जो हो चुकी हैं ! “बहुत अच्छी तरह प्रगत किये हैं |

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
July 13, 2016

सहर्ष धन्यवाद !


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