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कुछ हक़ीकत से रूबरू...कुछ मन की गुफ्तगू...

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राजनीति सर्वशक्तिमान...हर जगह विराजमान !

Posted On: 1 Jul, 2016 Junction Forum,Politics,Social Issues में

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मुंबई की बरसाती सुबह में घर पर गर्म चाय की चुस्कियाँ लेते जब टेलीविज़न चालू किया तो देखते ही आँखे शर्मसार हो गयी जब देखा कि राजनीति की दानवीयता बढ़ते बढ़ते साक्षात सरस्वती की दहलीज तक पहुँच चुकी हैं स्वयं सरस्वती से सौदा करने उन भावी भविष्य रूपी बच्चों का जिन्होने इम्तिहान के तौर पर अभी तक महज बोर्ड की कुछ परिक्षाएँ दी हैं !अच्छे अंकों से सफल होने की प्रतियोगिता के लालच की काली करतूत अब बिहार के जंगल राज से प्रारंभ होते होते महाराष्ट और गुजरात तक पहुँच चुकी हैं ! जहाँ कुछ बच्चे परीक्षा में ग़ैरहाजिर होकर भी अंकतालिओं में सफल हो गये वही कुछ बच्चे जिन्होने सफल होने की उम्मीद तक नही की वो राज्य में टॉप कर गये ! अब दोष किसका हैं ये तो शिक्षा विभाग के उच्च गरिमामय पदों पर बैठे कुछ महानुभाव ही बता सकते हैं जिनकी जेब गर्म हुई हैं या फिर जिन्होने अपनी रिश्तेदारी निभाई हैं ! शाला में जहाँ बच्चे हंसते हुए नज़र आते थे आज वही बच्चे क़ानून की हथकड़ियों में फँसते नज़र आ रहे हैं आख़िर ऐसा क्यूँ ? शायद अभी भी असली गुनाहगारों को पकड़ने से हाथ काँप रहे हैं पुलिस के आख़िर हैं तो एक ही सरकारी बिरादरी के सारे के सारे ! चोर चोर मोसेरे भाई ! एक बात तो अब हर कोई जान चुका हैं कि राजनीति हर जगह मौजूद हैं चाहे वो इंसाफ़ की अदालत हो जहाँ बलात्कार से पीड़ित एक लड़की क़ानून के कटघरे में चीख लगा लगा कर विनती कर रही हैं कि मेरा अब और इम्तिहान मत लो सबूतों के नाम पर या फिर शिक्षा का मंदिर कोई जहाँ से निकलकर लाल बहादुर शास्त्री जैसा एक साधारण बच्चा देश के नवनिर्माण में अपना अहम योगदान देता हैं ! सोचो इस तरह फर्जी दस्तावेज़ों से सफल होने वाले बच्चे आगे भविष्य में देश का क्या भला करेंगे ? क्या अंको की अधिकता ही सब कुछ हैं एक इम्तिहान में ? जिस तरह से ये सच सामने आ रहे हैं वो दिन दूर नही हैं जब हर एक बच्चा जनता के सवालों के कटघरे में होगा जिसने इम्तिहान दिया हैं ! अब वक़्त हैं एक इम्तिहान उनका लेने का जिनके हाथों ने हस्ताक्षर किए हैं काली करतूतों के इन काले कागजों पर ! शायद आप को खुद ब खुद परिणाम देखने को मिल जाएगा आरक्षण का ! ये हाथ भी उन्ही लोगों के होंगे जो खुद सफलता के संकड़े रास्ते से निकल के आए हैं ! अब ये तो सर्वविदित ही हैं कि आज हिन्दुस्तान में आरक्षण का परिणाम हर कोई भुगत रहा हैं कोई एक इंसान ऐसा नही होगा जो अपने जीवन में इस आरक्षण प्रणाली के बुरे अनुभव से नही गुजरा हैं ! अब ज़रूरत हैं एक बार फिर से संविधान की किताब पर जमी धूल की सफाई करने की ..कुछ पन्ने नये जोड़ने की…कुछ पन्ने पुराने फाड़ने की…जब देश बदल रहा हैं…दुनिया बदल रही हैं…तो संविधान में परिवर्तन क्यूँ नही ? आख़िर संतुलन नाम की भी कोई चीज़ होती हैं या नही या फिर हिन्दुस्तान इसी तरह कभी इधर कभी उधर गिरता रहेगा एक तराजू की तरह जिसका एक पलड़ा हल्का तो दूसरा भारी आख़िर असंतुलन का परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा ! खैर जो भी हैं मुझे तो कवि इकबाल की लिखी कविता याद आ रही हैं…..
“रुलाता हैं तेरा नज़ारा
ए हिन्दुस्तान मुझको
कि इबरतखेज हैं तेरा फसाना
सब फसानों में
छुपा कर आस्तीन में
बिजलिया रखी हैं आसमाँ ने
अनादिल बाग के गाफील
न बैठ आशियानों में
वतन की फ़िक्र कर नादान
मुसीबत आने वाली हैं
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं
आसमानों में
ज़रा देख इसको जो कुछ हो रहा हैं
और होने वाला हैं
धरा क्या हैं भला
अबीद-ए-कुहन की दास्तानों में “

लेखक- जितेंद्र हनुमान प्रसाद अग्रवाल “जीत”
मुंबई..मो.08080134259



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
July 1, 2016

प्रिय जितेन्द्र कम उम्र में इतनी विचारों की गहराई उत्तम सोच सराहनीय है जब की आज की जेनरेशन अमेरिकन कल्चर से भी आगे निकल गई है

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
July 1, 2016

माता श्री ! कम उम्र में वक़्त के थपेड़ों ने मुझे वो सीखा दिया जो शायद मुझे दुनिया की कोई पाठशाला और शिक्षक नही सीखा सकता था..शुक्रगुज़ार हूँ ऊपरवाले का जो मैं पैसो से अर्जित नही कर सकता था वो मैने बुरे वक़्त से अर्जित कर लिया…

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
July 1, 2016

शायद इस कविता में आपको जबाब मिल जाएगा… स्मृतियों के दर्पण से झाँकता हैं तन्हा मन जब कभी अतीत में खुशियाँ सारी शून्य प्रतीत होती हैं हार लगती हैं हर जीत में धारा अश्रुओं की मेरे साहस की दहलीज लाँघ लेती हैं नियति की अनहोनी मेरे मासूम हाथों को बाँध देती हैं नम नयनों के नयनपटल पर अंकित एक आकृति होती हैं शायद कुछ बोलना हो मुझसे प्रतीत ऐसे तस्वीर पापा की होती हैं संघर्षमय संकटमय समय के चित्र जब सामने आते हैं भावनाओं के भयंकर धक्के हृदय को झकझोर जाते हैं देखता हूँ उन्हे जब मुश्किलों की शृंखला में बँधे होकर भी हँसते हुए शून्य मुझे अपना अस्तित्व लगता हैं दबते गये दुख की दीवार तले भाग्य का लेखा मानकर अमिट असरदार अदभुत उनका व्यक्तित्व लगता हैं हैं जीवित जेहन में बचपन अभावों का जब पैसे कमाने पापा दुकान जाते और शाम थके लौटकर आते थे उनका हँसना शायद झूठ था या थी शायद नासमझी हमारी जो सच्चाई कभी हम समंझ नही पाते थे बहन थी बड़ी मुझसे मगर बड़ी वो भोली थी जानती थी अंतर अमीरी ग़रीबी का ख्वाहिशों की खिड़कियाँ कभी ना उसने खोली थी भाई था छोटा सबको जो एक समझता था धरती को माँ कहता और पिता खिलोनों को लिखा कहाँ विधि का वो लेख समझता था संघर्ष की शृंखला में साल बदलते जाते थे हम टूटी पाटी पर पढ़ते लिखते पहली से दूसरी और दूसरी से तीसरी में आ जाते थे हर्षाता कितना हमारा उतीर्ण होना पापा को उतीर्ण की खुशी में मिठाई महँगी बँटवाते थे अब जब असली गिनती सीखे हैं तब मालूम होता हैं पापा हमे कैसे पढ़ाते थे सिखाएँ संस्कार सदाचार तो पापा ने हमे पढ़ाने बेकार ही शिक्षक किताबें मँगवाते थे कितने आशावादी थे पापा भुलाकर अपना वर्तमान भविष्य की खातिर हमारे कितना कष्ट उठाते थे होली के रंग पिचकारी दीवाली के पटाखे होते थे बच्चों की खुशी खातिर तकलीफ़ों के तमाशें होते थे खुद के पुराने वस्त्र नये हमारे कपड़े होते थे जाने कितने इम्तिहान पापा के कड़े होते थे खुद पसीना करके गर्मी में कुलफी हमे खिलाते थे सर्द शाम में काँपते हाथ कभी वो मूँगफली लाते थे छोटी जेब वाला वो हृदय कितना विराट था तकलीफें जिसमे अपनी वो सारी छिपाते थे भर आता मन जब भर भर डोर चरखी लोग पतंग उड़ाते थे थे अंतर्यामी कितने देखकर दौड़ता मुझे पतंग पापा ले आते थे भूलकर अमावस अभावों की करवा चौथ याद रखते गणगौरी तीज पर खिलाने कचोरी मेले में ले जाते थे पोंछते मुँह हमारा हँसकर हाथ से गोला बर्फ का हम जब चूस चूस कर खाते थे नटखट नन्हे मासूम कितने शेतान थे हम पापा को जो रोज कितना सताते थे बदली परिस्थितियाँ जब समय परिवर्तन के साथ सुहानें वक़्त ने सुधारें जब बिखरें घर के हालात खुद के पाँवों पर जब मैं खड़ा हो गया पापा का बेटा “जीत” अब जब बड़ा हो गया सोचा कुछ हँसी हाथों से पापा के अधरों पर धर दूं मुश्किलों की शृंखला से अब आज़ाद उन्हे कर दूं खुशियों की चेहरे पर तनिक उनके जो हलचल होने लगी थी जेब फटी सिल गई मगर देह दिनो दिन दुर्बल होने लगी थी समय बदला मगर भाग्य उनका बदल नही पाया आख़िर असर लंबा कोई दवा का चल नही पाया किस्मत एक रोज फिर मुझसे विश्वासघात कर गयी सोची नही जो कभी वो ही अनहोनी बात कर गयी जज्बातों का जहर पीकर जबरन खुद को समझाना पड़ा अंगुली पकड़ चला जिनकी उनको कंधों पर ले जाना पड़ा उम्र छोटी थी मेरी मगर इम्तिहान बहुत बड़ा था सामने लंबा रास्ता कठिन और अकेला खड़ा था चलते चलते नन्हे कदमों से यहा तक आया हूँ हूँ खाली खाली जैसे पीछे बहुत कुछ छोड़ आया हूँ हो राह कोई जीवन का सारांश बस एक ही निकलता हैं हारता हैं रुकने वाला जीतता हैं वो जो हर हाल में चलता हैं हैं पास मेरे जो आज नम आँखों से पापा को अर्पण करता हूँ हो गयी देर बहुत दूर आँखों से अब स्मृतियों का दर्पण करता हूँ !! “जीत”

Shobha के द्वारा
July 2, 2016

जितेन्द बहुत लोग या अधिकांश लोग असमर्थ होते हैं जानते हो जब मेरे पिता को भगवान ने उठाया पूरा परिवार कच्चा था हम छह भाई बहन थे ऐसा लगा था जैसे भरा जहाज समुद्र में छोड़ दिया गया हो आज सब ठीक हो गया समय की बात हैं बस होसला बना रहे |आज भी पिता की बरसी पर अम्मा को घेर कर सब सिर जोड़ क्र बैठ जाते हैं

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL के द्वारा
July 4, 2016

बहुत धन्यवाद आपका जो आपने भी कुछ अपने बार में मुझे बताया..आशा करता हूँ भविष्य में इसी तरह आपसे और आपके लेखन से जुड़ा रहूँगा…


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